मेटा प्लेटफॉर्म्स ने सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (CCPA) के 1 जनवरी के आदेश के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में अर्जी दाखिल की है। कंपनी ने कोर्ट में कहा कि फेसबुक मार्केटप्लेस को गलत तरीके से ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म माना गया है और CCPA के अधिकार क्षेत्र से बाहर ऐसे रेगुलेटरी जिम्मेदारियां लगाए गए हैं। यह आदेश वॉकी-टॉकी की लिस्टिंग से संबंधित मामले में आया था, जिसमें CCPA ने मेटा को कंज्यूमर और IT कानूनों का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया।
CCPA ने न केवल इस तरह की लिस्टिंग के लिए कंप्लायंस की जिम्मेदारियां लगाईं, बल्कि कानूनी मंजूरी की जरूरत वाले सभी प्रोडक्ट्स के लिए सख्त डिस्क्लोजर और रेगुलेटरी पालन को अनिवार्य कर दिया। मेटा ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह आदेश मूल जांच के दायरे से बाहर है और बिना उचित जवाब का मौका दिए बहुत सारी जिम्मेदारियां थोप रहा है। कंपनी ने इसे कानूनी रूप से गलत और अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया।
मेटा ने जोर देकर कहा कि फेसबुक मार्केटप्लेस एक फ्री, यूज़र-ड्रिवन प्लेटफॉर्म है, जहां लोग व्यक्तिगत तौर पर सामान लिस्ट करते हैं। यह पेमेंट, डिलीवरी या ऑर्डर प्रोसेसिंग की सुविधा नहीं देता और न ही किसी लेनदेन में कमीशन या मध्यस्थ के रूप में काम करता है। मेटा का कहना है कि ये फीचर मार्केटप्लेस को पारंपरिक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से अलग करता है और इसे ई-कॉमर्स नियमों के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क से बाहर रखता है।
कंपनी ने यह भी कहा कि CCPA के आदेश कई तरह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक समान रेगुलेटरी बोझ डाल सकता है, जिससे आम यूज़र्स पर असर पड़ेगा। मेटा ने इंटरमीडियरी गाइडलाइंस पर CCPA के भरोसे को भी चुनौती दी और तर्क दिया कि अथॉरिटी ने कानून के तहत नहीं दी गई जिम्मेदारियां थोप दी हैं।
मेटा की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी और अरविंद दातार ने कहा कि फेसबुक मार्केटप्लेस Amazon और Flipkart जैसे प्लेटफॉर्म से बिल्कुल अलग है। यह सिर्फ एक डिजिटल नोटिस बोर्ड है, जहां यूज़र्स अपने आप जुड़ते हैं, बिना प्लेटफॉर्म के कमर्शियल ट्रांज़ैक्शन की सुविधा या फीस लिए।
सुनवाई के दौरान जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने सवाल किया कि मेटा ने नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) से संपर्क क्यों नहीं किया। जवाब में रोहतगी ने कहा कि मामला अधिकार क्षेत्र की पूरी कमी से जुड़ा है, न कि सिर्फ प्रक्रिया से जुड़ी गलती से। कोर्ट ने मेटा को छोटी लिखित दलीलें दाखिल करने की अनुमति दी और 25 मार्च को आगे सुनवाई तय की गई, जिसमें तय होगा कि विवादित आदेश कानून में कायम रह सकता है या नहीं।














