लखनऊ: उत्तर प्रदेश में बहुचर्चित पेपर लीक मामलों की लंबी कानूनी प्रक्रिया और पेचीदगियों का एक और उदाहरण सामने आया है। साल 2006 में लखनऊ के कृष्णानगर थाने में दर्ज एक ही एफआईआर (FIR) में नामजद विधायक बेदी राम और विपुल दुबे से जुड़े पेपर लीक मुकदमे की सुनवाई पिछले करीब दो दशकों से कानूनी अड़चनों में उलझी हुई है। स्थिति यह है कि पिछले दो साल से मुकदमे के मुख्य वादी और तत्कालीन एडिशनल एसपी एसटीएफ (STF) राजेश पांडेय की गवाही तक पूरी नहीं हो सकी है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, आईजी बरेली पद से रिटायर हो चुके राजेश पांडेय हाल ही में अपनी गवाही देने के लिए अदालत पहुंचे थे, लेकिन कानूनी प्रक्रिया और फाइलें लंबित होने का हवाला देकर उन्हें बिना गवाही दिए ही वापस लौटना पड़ा। इस मामले की सबसे बड़ी कानूनी अड़चन यह है कि विधायक बेदी राम और विपुल दुबे दोनों के नाम एक ही एफआईआर में दर्ज हैं, जिससे ट्रायल और सुनवाई के दौरान कई तकनीकी पेंच फंस जाते हैं।
कानूनी जानकारों का मानना है कि दो दशक पुराना यह मामला उत्तर प्रदेश की न्याय और जांच प्रणाली के सामने एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। गवाहों के समय पर पेश न हो पाने और कानूनी प्रक्रियाओं के लंबा खींचने के कारण मामलों के निस्तारण में देरी हो रही है, जिससे इस हाई-प्रोफाइल पेपर लीक मामले पर एक बार फिर से सबकी नजरें टिक गई हैं।













