बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के बाद बहुजन आंदोलन को नई दिशा देने वाले बसपा संस्थापक कांशीराम का नाम आज फिर से सियासत के केंद्र में आ गया है। कांशीराम एक ऐसा नाम बन चुके हैं जिसके सहारे लगभग सभी राजनीतिक दल दलित वोटबैंक को अपने पक्ष में करने की रणनीति बना रहे हैं। उनकी जयंती को अब सिर्फ एक स्मरण दिवस नहीं बल्कि एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक आयोजन के रूप में मनाया जा रहा है। कई दल इसे त्यौहार की तरह मनाकर दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। इसी कारण कांशीराम की जयंती पर कार्यक्रमों, रैलियों और श्रद्धांजलि सभाओं का आयोजन बढ़ गया है और दलित राजनीति के केंद्र में उनका नाम लगातार चर्चा में बना हुआ है।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीतिक पार्टियों के इस रवैये से दलित वोटबैंक वास्तव में उनकी ओर आकर्षित होगा या फिर बसपा का पारंपरिक वोटर अब भी बसपा के साथ ही मजबूती से खड़ा रहेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांशीराम के नाम और उनकी विचारधारा को लेकर कई दल दलित समाज के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश जरूर कर रहे हैं। कार्यक्रमों और श्रद्धांजलि सभाओं के जरिए संदेश देने की कोशिश होती है कि वे भी बहुजन राजनीति और सामाजिक न्याय की बात करते हैं।
हालांकि दूसरी ओर यह भी माना जाता है कि बसपा का एक बड़ा और कोर वोटबैंक अब भी खुद को कांशीराम और बहुजन आंदोलन की मूल राजनीतिक विरासत से जोड़कर देखता है। ऐसे में केवल प्रतीकात्मक सम्मान या जयंती कार्यक्रमों से उस वोटर को पूरी तरह अपनी ओर खींच पाना आसान नहीं माना जा रहा। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि दलित समाज किस हद तक इन कोशिशों से प्रभावित होता है या फिर वह बसपा के साथ ही अपनी पारंपरिक राजनीतिक पहचान को बनाए रखता है।
बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक Kanshi Ram ने दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों को संगठित करने के लिए कई ऐसे राजनीतिक नारे दिए जिनसे बहुजन राजनीति को बड़ी ताकत मिली। इन नारों के जरिए उन्होंने दलित समाज में राजनीतिक जागरूकता और एकता पैदा करने की कोशिश की। इन नारों की वजह से कांशीराम ने दलित और बहुजन समाज में मजबूत राजनीतिक चेतना पैदा की और यही आधार आगे चलकर बसपा की राजनीति की नींव बना।
कांशीराम के प्रमुख राजनीतिक नारे:
1️⃣ “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी”
“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” का नारा बहुजन राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माना जाता है। इस विचार का मूल अर्थ यह था कि समाज में जिस वर्ग की जितनी आबादी है, उसे सत्ता, संसाधनों और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी उतनी ही भागीदारी मिलनी चाहिए। यह नारा सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की राजनीति को मजबूत करने का प्रतीक बना। बहुजन आंदोलन के दौरान इस विचारधारा को खास पहचान मिली और इसे दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों को राजनीतिक रूप से संगठित करने के एक बड़े सूत्र के रूप में देखा गया। यही कारण है कि आज भी कई राजनीतिक दल इस नारे और विचारधारा का उल्लेख कर सामाजिक संतुलन और बराबरी की राजनीति की बात करते हैं।
2️⃣ “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय”
इस नारे के जरिए कांशीराम ने बहुजन समाज (दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक) की एकता और उनके हितों की राजनीति को केंद्र में रखा।
3️⃣ “तिलक, तराजू और तलवार — इनको मारो जूते चार”
यह नारा शुरुआती दौर में बहुजन आंदोलन की आक्रामक राजनीतिक पहचान बना। हालांकि बाद में बसपा ने अपनी रणनीति में बदलाव भी किया।
4️⃣ “वोट हमारा, राज तुम्हारा — नहीं चलेगा”
इस नारे के जरिए दलित समाज को राजनीतिक रूप से जागरूक करने का प्रयास किया गया कि उनका वोट तो लिया जाता है लेकिन सत्ता में उनकी भागीदारी नहीं होती।
‘सामाजिक न्याय के पुरोधा कांशीराम को नमन : सीएम योगी
सूबे के मुखिया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। सीएम योगी ने अपने संदेश में कहा कि दलित, शोषित और वंचित समाज के उत्थान के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने वाले सामाजिक न्याय के पुरोधा कांशीराम का योगदान देश की सामाजिक और राजनीतिक चेतना में महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने लिखा कि दलित, शोषित एवं वंचित वर्ग के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले तथा सामाजिक न्याय की लड़ाई को नई दिशा देने वाले बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम जी की जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
राहुल गाँधी के बयान से यूपी की सियासत में नई बहस
कांशीराम की जयंती से पहले 13 मार्च को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक नया राजनीतिक दांव चलकर यूपी की सियासत में नई बहस छेड़ दी। उन्होंने कहा कि अगर कांशीराम जी पंडित नेहरू के दौर में होते तो वह कांग्रेस पार्टी से मुख्यमंत्री होते। राहुल गांधी ने कहा कि अब समय आ गया है कि देश में राजनीति का स्वरूप बदला जाए और ऐसी राजनीति हो जिसमें सबकी हिस्सेदारी हो। उन्होंने बहुजनों के अधिकारों की राजनीति और संविधान के रास्ते पर चलने वाली राजनीति की बात कही। अपने बयान में राहुल गांधी ने कांशीराम के योगदान को याद करते हुए उन्हें भारत रत्न देने की भी मांग कर दी। उनके इस बयान के बाद यूपी की राजनीति में चर्चा तेज हो गई है क्योंकि दलित राजनीति और बहुजन आंदोलन से जुड़े मुद्दे एक बार फिर केंद्र में आ गए हैं।
राहुल के बयान पर मायावती का पलटवार
राहुल गांधी के बयान के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने तीखा पलटवार करते हुए कांशीराम की जयंती पर लंबा संदेश जारी किया। उन्होंने कहा कि बहुजन समाज पार्टी के जन्मदाता और संस्थापक मान्यवर कांशीराम को उनकी जयंती पर वह स्वयं और उनके नेतृत्व में पूरे देश के अनुयायी शत-शत नमन और श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हैं। मायावती ने कहा कि कांशीराम ने परमपूज्य बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की सोच और आंदोलन को पूरे देश में जीवित रखने का काम किया और उनके कारवां को सत्ता की मंजिल तक पहुंचाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। मायावती ने कहा कि कांशीराम ने जाति के आधार पर बंटे और दबाए गए लोगों को बहुजन समाज की एकता में जोड़ने का ऐतिहासिक काम किया। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों से अपील की कि वे बसपा के ‘सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति’ के आंदोलन को तन-मन-धन से मजबूत करें और पूरी मजबूती के साथ चुनावी सफलता हासिल करने का संकल्प लें। बसपा प्रमुख ने बहुजन समाज से यह भी आह्वान किया कि वे बसपा आंदोलन से जुड़कर मिशनरी और ईमानदार अम्बेडकरवादी बनें तथा अपने वोट की ताकत से सत्ता की ‘मास्टर चाबी’ हासिल करें। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा संविधान में दिए गए अधिकारों को जमीन पर लागू कर बहुजनों के हित, कल्याण, उत्थान और आत्मसम्मान की रक्षा की जा सकती है। मायावती के मुताबिक यही कांशीराम का मिशन और उनका जीवन संदेश भी था।
सामाजिक परिवर्तन के महानायक मान्यवर श्री कांशीराम जी की जयंती पर शत-शत नमन : अखिलेश यादव
वहीं बहुजन नेता और बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी। अखिलेश यादव ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “सामाजिक परिवर्तन के महानायक मान्यवर श्री कांशीराम जी की जयंती पर शत-शत नमन। अखिलेश यादव पिछले कुछ समय से ‘PDA’ की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। इसी सामाजिक समीकरण को साधने की रणनीति के साथ वह लगातार बहुजन और पिछड़े वर्ग को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीते लोकसभा चुनावों में इस रणनीति का समाजवादी पार्टी को फायदा भी मिला था और कई सीटों पर पार्टी को अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन देखने को मिला।













