उत्तर प्रदेश के संभल जिले से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पुलिस और निचली अदालत के मजिस्ट्रेट की कार्यप्रणाली पर बेहद तीखा प्रहार किया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि गिरफ्तारी के ‘कारण’ और ‘आधार’ में जमीन-आसमान का फर्क होता है। न्यायालय ने पुलिस और मजिस्ट्रेट को संविधान का पाठ पढ़ाते हुए ‘कॉपी-पेस्ट’ और पहले से छपे प्रिंटेड प्रोफार्मा पर आंख मूंदकर रिमांड देने की संस्कृति को तत्काल प्रभाव से बंद करने का कड़ा निर्देश दिया है।
यह पूरा मामला संभल जिले के गुन्नौर थाने से जुड़ा है, जहाँ पुलिस ने राकेश नाम के एक आरोपी को गिरफ्तार किया था। आरोप है कि पुलिस ने गिरफ्तारी मेमो में केवल पहले से छपे सामान्य कारणों जैसे सबूत मिटाने से रोकना या जांच में सहयोग न करना के आगे ‘हाँ’ लिखकर अपनी औपचारिकता पूरी कर ली और आरोपी को यह लिखित रूप में स्पष्ट नहीं किया कि उसे किन विशिष्ट कानूनी आधारों पर पकड़ा गया है। संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत यह अनिवार्य है कि गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी समझ आने वाली भाषा में गिरफ्तारी के ठोस आधार बताए जाएं, केवल जनरल डायरी में प्रविष्टि कर देना पर्याप्त नहीं है।
लापरवाही की हद तब पार हो गई जब यह मामला रिमांड मजिस्ट्रेट की अदालत में पहुंचा। मजिस्ट्रेट महोदय ने अपने संवैधानिक दायित्वों को निभाने के बजाय एक रबर स्टैंप की तरह काम किया और पहले से छपे एक ‘प्रिंटेड प्रोफार्मा’ में खाली जगह भरकर आरोपी को जेल भेज दिया। इस यांत्रिक और गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर गहरी नाराजगी जताते हुए, न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने इस अवैध रिमांड आदेश को सिरे से खारिज कर दिया और आरोपी राकेश को तत्काल मुचलके पर रिहा करने का आदेश जारी किया।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि मजिस्ट्रेट का कार्य केवल पुलिस की फाइलों पर आंख मूंदकर हस्ताक्षर करना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि क्या पुलिस ने किसी नागरिक की स्वतंत्रता छीनने से पहले सभी कानूनी प्रक्रियाओं का सही ढंग से पालन किया है या नहीं। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने संभल के जिला जज को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे अपने अधीनस्थ सभी मजिस्ट्रेटों को चेतावनी दें कि भविष्य में इस तरह की ‘रिक्त स्थान भरें’ वाली प्रिंटेड रिमांड प्रथा को पूरी तरह बंद किया जाए।



