अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते के न होने के पीछे एक नया दावा किया है। उनके अनुसार, यह समझौता मई और जुलाई 2025 के बीच हस्ताक्षर के लिए तैयार था, लेकिन यह इसलिए विफल हुआ क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को व्यक्तिगत रूप से फोन कर सौदे को अंतिम रूप देने में असहजता दिखाई। हालांकि, इसके पीछे की असली वजह ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद पैदा हुई कूटनीतिक तल्खी बताई जा रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब यह समझौता होने वाला था, उसी समय भारत और पाकिस्तान के बीच भारी तनाव था। भारत ने 7 मई को पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को नष्ट करने के लिए ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। इसके ठीक बाद 10 मई को दोनों देशों के बीच युद्ध विराम की घोषणा हुई। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर यह दावा किया कि उन्होंने युद्ध विराम में मध्यस्थता की है, जिस पर भारत ने सिरे से खारिज कर दिया। इस दावे के कारण दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया और अमेरिका उम्मीद कर रहा था कि पीएम मोदी ट्रंप को फोन करेंगे, लेकिन भारत इसके लिए तैयार नहीं था।

लुटनिक ने यह भी दावा किया कि भारत ने समझौते पर हस्ताक्षर करने में तीन हफ्ते की देरी कर दी, जिससे वह “ट्रेन मिस” कर चुका था। उन्होंने ट्रंप की ‘सीढ़ी’ नीति का हवाला दिया, जिसके अनुसार पहले आने वाले देशों को सबसे कम टैरिफ मिलता है, लेकिन भारत के लिए यह टैरिफ 50% तक बढ़ गया। हालांकि, व्यापारिक आंकड़े लुटनिक के दावे से अलग थे। अमेरिका ने ब्रिटेन और वियतनाम जैसे देशों के साथ 10% और 20% टैरिफ पर समझौता किया था, लेकिन भारत के लिए सबसे ऊंचा टैरिफ बरकरार रखा।

रूस के साथ भारत के ऊर्जा और रक्षा संबंध भी व्यापार वार्ता में एक बड़ी बाधा बने। भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 37% थी, और अगस्त 2025 में रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण ट्रंप ने भारत पर 25% अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगा दिया। इससे पहले लुटनिक ने यह भी कहा था कि भारत का रूस से सैन्य उपकरण खरीदना और BRICS के माध्यम से डॉलर पर निर्भरता कम करना अमेरिका को नागवार गुजरा था।

इस बीच थिंक टैंक GTRI के प्रमुख अजय श्रीवास्तव ने लुटनिक के दावों पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि इतने बड़े व्यापारिक समझौतों का रुकना महज एक नेता के फोन कॉल न करने से नहीं हो सकता। यह दावा एक ‘तर्क’ जैसा लगता है। उनके अनुसार, टैरिफ, कृषि, डिजिटल व्यापार और नियामक स्वायत्तता जैसे मुद्दों पर अनसुलझे नीतिगत मतभेद ही इस समझौते के न हो पाने की असली वजह थे।

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